“पैमाना”

मैंने पूछा ‘पैमाने’ से, ये कैसा जीवन तेरा है?

खालीपन तुझमें छाया है, या फिर मदिरा का घेरा है।

 

पत्थर से तुझको पीस-पीस, फिर खूब जलाया जाता है।

जब ह्रदय तेरा जल जाता है तो रंग मिलाया जाता है।

 

तेरे जलते खून से फिर सांचे सींचे जाते हैं।

ठन्डे होते खून में अरमां तक जम जाते हैं।

 

जब जाम ख़त्म हो जाता है तो फ़ेंक दिया तू जाता है।

तेरा मिट्टी का यह शरीर तब ख़ुद मिट्टी हो जाता है।

 

पैमाने ने डांटा मुझको, बोल चुप रह क्या बकता है।

जो डरा आग की शिद्दत से, कुंदन कैसे बन सकता है।

 

‘मधुशाला’ में आने वाला, इज्ज़त मुझको फ़रमाता है।

होंठों से मुझे लगाने पर ही जाम कोई पी पाता है।

 

सल्तनत यहाँ पर मेरी है, नेताओं का ये राज नहीं।

सब मयकश मेरे अपने हैं, ये हिन्दू-मूसलमान नहीं।

 

पंडित आयें, मौलाना भी, जो चाहे होंठों से चूमे।

मुझमें तो मय का सागर है, जूठे का कोई नाम नहीं।

 

मैं मरने पर भी प्यारा हूँ, भाईचारा फ़ैलाता हूँ।

तू जीकर भी नाकारा है, भाई-भाई लड़वाता है।

 

जा बना इबादतघर जिसमें हिन्दू-मुस्लिम आयें सारे,

जहाँ छोटा-बड़ा न हो कोई, जहाँ प्यार गुनगुनायें सारे।

 

हाँ उस दिन तो ये पैमाना तुझसे छोटा हो जायेगा,

मेरा मिट्टी का यह शरीर, तब ख़ुद मिट्टी हो जायेगा।

 

–         हिमांशु

2 Comments

  1. Muskaan 05/06/2013
  2. Himanshu Srivastava Himanshu 05/06/2013

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