“श्रम-आराधना”

एक कहानी सुन लो तुम,

मैं आज तुम्हें समझाता हूँ।

“है कर्म सफलता की कुंजी”

मैं ये रहस्य बतलाता हूँ।

 

एक गुरु हुए हैं तेजस्वी,

जो बोपदेव कहलाते थे।

गुण, ज्ञान, शील में देव तलक

भी मेल न उनसे खाते थे।

 

हाँ वही गुरूजी बोपदेव

जब विद्या अर्जन करते थे,

थी बुद्धि प्रखर, पर रंचमात्र भी

नहीं कभी श्रम करते थे।

 

वे श्रम से भागे जाते थे

तो विद्या पास न आती थी।

गुरुवर जब लिखने को कहते

लेखनी नहीं उठ पाती थी।

 

एक दिवस गुरु ने फटकारा,

फिर समझा कर के छोड़ दिया।

पर बोपदेव को ग्लानि हुई,

गुरुकुल ही उसने छोड़ दिया।

 

विद्या अर्जन का बोझ हटा,

थे बहुत प्रफुल्लित बोपदेव।

कहते, “वापस ना जाऊंगा,

विद्या से मुझको नहीं नेह।

 

जब बुद्धि साथ नहीं देती,

फिर क्योंकर करूँ पढाई यह।

मैं क्यों ना मन की बात सुनूँ,

जीवन में करूँ बड़ाई यह।”

 

थे चले जा रहे बोपदेव,

तब कूप दिखाई पड़ा एक।

घट पर घट भरते जाते थे,

थे वहीँ घड़े रक्खे अनेक।

 

सोचा जाकर जल पी लूं मैं,

फिर यहीं कहीं पर करूं स्नान।

है गला प्यास से सूख रहा,

तन में भी लगती है थकान।

 

यह सोच कूप पर जब पहुंचे,

तो हुआ उन्हें आश्चर्य एक,

जिस पत्थर पर था घट रक्खा,

उसमें था गड्ढा हुआ एक।

 

तब बोपदेव ने यह सोचा,

“जब पत्थर भी घिस सकता है,

जब मात्र घड़े के रखने से

गड्ढा इसमें पड़ सकता है।

 

झरने पर जल के बहने से

जब चट्टानें कट जाती हैं।

जब चींटी अपने पर आये

हाथी को मार गिराती है।

 

एक-एक तिनके को रखने से

घोसला पूर्ण बन जाता है।

प्रति एक बूँद जुड़ जाने से

सम्पूर्ण घड़ा भर जाता है।

 

विषधर के फन के नीचे से

मणि तक निकाल कर लाते हैं।

निर्भय जल में जाने वाले

सच्चा मोती ले आते हैं।

 

जब इतना सब हो सकता है

तो विद्या भी आ सकती है।

आलस्य कमी है बस मेरी,

जो पूर्ण अभी हो सकती है।

 

आलस्य व्यक्ति जो करते हैं,

जो श्रम से भागे फिरते हैं।

वे जीवन भर पछताते हैं,

आखिर में जाकर रोते हैं।

 

वापस फिर गुरुकुल जाऊंगा,

और क्षमा गुरु से पाऊंगा।

अभ्यास करूँगा अविरल मैं,

अब सारी विद्या पाऊंगा।”

 

फिर वापस लौटे बोपदेव,

श्रम का अब आँचल थाम लिया।

विद्या-अध्यन को पूर्ण किया,

जग में भी ऊँचा नाम किया।

 

बस यही कहूँगा तुमसे मैं,

जड़ भी सुजान हो जाते हैं।

श्रम करने वालों के आगे,

पर्वत मैदान हो जाते हैं।

 

तो छोड़ो आलस की डोरी,

श्रम से अब नाता जोड़ो तुम।

बस ‘बोपदेव’ को याद करो,

शुभकर्म नया अब छेड़ो तुम।

 

 

–         हिमांशु

 

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