“गीत”

जीने का मौका तुम दे दो मुझे ।

शायद फिर जीवन मिले ना मिले ।

कहती रहो तुम मैं सुनता रहूँ,

के जीने की फ़ुर्सत रही अब किसे ।

 

चाहे तो ये वक़्त अब ना बढ़े ।

चाहे तो मौसम बदलता रहे ।

चाहे ख़ुदा भेज दे ज़लज़ले,

के जीने की फ़ुर्सत रही अब किसे ।

 

चाहे ये तूफ़ान की रात हो ।

चाहे ये काँटों भरा ताज हो ।

चाहे मुकद्दर बने या मिटे,

के जीने की फ़ुर्सत रही अब किसे ।

 

चाहे दवा या दुआ दो मुझे ।

चाहे तो जीवन-सुधा दो मुझे ।

विष दो या अमृत पिला दो मुझे,

के जीने की फ़ुर्सत रही अब किसे ।

 

ये जीवन मुहोब्बत का आग़ाज़ है ।

ये जीवन एक टूटा हुआ साज़ है ।

ये जीवन का सागर डुबो ले मुझे,

के जीने की फ़ुर्सत रही अब किसे ।

 

–         हिमांशु

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