ग़ज़ल (बीमार ट्रेन्ड)

मेरे जिस टुकड़े को दो पल की दूरी बहुत सताती थी
जीवन के चौथेपन में अब ,बह सात समन्दर पार हुआ .

रिश्तें नातें -प्यार की बातें , इनकी परबाह कौन करें
सब कुछ पैसा ले डूबा अब जाने क्या ब्यबहार हुआ ..

दिल में दर्द नहीं उठता है भूख गरीबी की बातों से
धर्म देखिये कर्म देखिये सब कुछ तो ब्यापार हुआ …

हुयी अपनों से अनबन है और गैरों से लगा मन है
अब मायूसी में युबा है और बचपन अब बीमार हुआ ….

जाने कैसे ट्रेन्ड हो गए मम्मी पापा फ्रेंड हो गए
शर्म हया और लाज ना जानें आज कहाँ दो चार हुआ …..

ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

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