धूप की बेवफाई के किस्से

धूप की बेवफाई के किस्से

उनींदी है धूप आज
लगता है एक उम्र से
सोई ही नहीं पलकें इसकी,
सूरज के आगोश की गर्मी से तृप्त
करवट बदलकर कभी-कभी
अनायास ही कसमसाती है ,
अपने होठों में पिछली रात की कहानी
छुपाने की नाकाम कोशिश करते-करते
बेख़याली से बुदबुदा जाती है |
दिन सुलग उठता है देखकर
सूरज की आँखों में लाल डोरे ,
गर्म लावा सा उफ़न उठता है
अंतस में उसके |
सुने थे उसने घटाओं से धूप की बेवफाई के किस्से
मगर……….
एक आस थी जो बंधी थी दिल में आज तलक ,
वो छन्न से गिरी………..
और बिख़र गई सुबह ही सुबह
किरणों की मानिंद एक चुप्पी ओढ़े |
कि गुज़र जाना किसी की चाहत से
नहीं है काम हर किसी के बस का ,
जिगर को सख्त बनाए रखना
अहसासों की छुअन से भी परे ,
ज़ब्त कर जाना आंसुओं की शिकायत,
किसी सिसकी के बिना ,
बदन पर किसी की ख़लिश को
सेकते हुए तन्हा-तन्हा |
मगर……………….
ये दिन है जो अपनी रुसवाई को लपेटे तन पे,
किसी नियम से बंधा ,
समाजों की हद मे जाने क्यों
रोज़ चला आता है |

 रजनी मोरवाल
अहमदाबाद
मो. 09824160612

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  1. Yashoda agrawal 30/05/2013

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