कहानी अनसुनी

इस पल की फिकर
किसी को नहीं यहाँ
जीने की परवाह तो है
पर जाने जिंदगी है कहाँ

हर पल में जीने वाले
जाने कहाँ खो गए
नए पल की खुशियों की खातिर
पल पल सब बस रो रहेकहानियों के समंदर में
जिंदगी मानो डूब रही है
कहीं तो कुछ है जो छुट रहा
ये उलझन बन कर हमसे पूछ रही है

सवालों के जाने कितने है पेड़ यहाँ
शिकायतों ने जिनमे अपने कई जाल बुनी है
आंसुओं की बारिश की आवाज में मानो
जिंदगी की कहानी रह गई अनसुनी है

काश ऐसा कोई हो
हर जख्म जो इस कदर सी सके
हर दर्द में भी लब ये मुस्कुराये
और जिंदगी अपना हर लम्हा यु ही जी सके

– प्रीती श्रीवास्तव ‘पर्ल’

Leave a Reply