सच्चे प्यार का अब, फ़साना नहीं रहा,

सच्चे प्यार का अब, फ़साना नहीं रहा,
शमा में जल जाये, वो परवाना नहीं रहा,

शायरी रूह तक पहुंचे, तो कैसे पहुंचे ?
अब मीर और ग़ालिब का जमाना नहीं रहा,

सियासत और हवस ने, पूरा शहर खोद डाला,
अब जमीं के नीचे छुपा हुआ, खजाना नहीं रहा,

सच और नेकी की राह में यह मोड़ भी आया,
खाने को रोटी और रहने को ठिकाना न रहा,

इश्क उनसे हुआ तो, हम जीते जी मर गए,
अब मौत के आने का बहाना नही रहा, —— “राज”

5 Comments

  1. Yashoda agrawal 27/05/2013
  2. Tushar Raj Rastogi 29/05/2013
  3. Dharmendra Sharma 30/05/2013
  4. मदन मोहन सक्सेना Madan Mohan saxena 30/05/2013
  5. Rajnish Sharma 21/06/2013

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