दिल में गम लबों पर मुस्कान रखतें है, भीड़ में अपनी अलग पहचान रखते है,

दिल में गम लबों पर मुस्कान रखतें है,
भीड़ में अपनी अलग पहचान रखते है,

फकीरों के ठाठ हमने अपना लिए,
पैरों में जमीं सर पर आसमान रखते है,

नए शहर के नए उसूल समझ नहीं आते,
खामोश रहते है काम से कम रखते है,

शहर के नामचीन भी अजीब होते है,
दीन धर्म ईमान, सबके डा रखते है,

मुट्ठी भर राख में सिमटना है एक दिन,
फिर क्यों लोग इतना गुमान रखते है ?

इस चका चौंध में कहीं भटक न जायें,
इसलिए हम ख़ुदा से दुआ – सलाम रखते है,

ये गाँव नहीं शहर है, संभालिये साहब,
यहाँ बगल छुरी, मुंह में राम रखते है,

—— “राज”

5 Comments

  1. Dharmendra Sharma 30/05/2013
    • Rajnish Shrama 21/06/2013
      • त्र्यम्बकेश्वर 28/01/2015

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