जीवन

कहीं है जीवन का आनंद |
कहीं मानस का अंतर्द्वंद ||
कहीं हैं खुशियों के प्रासाद |
कहीं है अंतर्मन का नाद ||

नूपुरो की सुंदर झंकार |
चकोरों की है करुण पुकार ||
सजा है खुशियों का संसार |
अपांगो से बहती जलधार||

बज रहा वीणा सुंदर राग |
जल रहा जीवन का अनुराग ||
पराकृत का है को’ई प्रयाग |
धधकती है संगम में आग||

पुरातन के अनमोल वितान |
खो चुके वे भी अपनी आन ||
दिखाता कोई झूठी शान |
खो रहा कोई अपना मान ||

खेलता कोई दिल का खेल |
अमृत विष का होता है मेल ||
ध्वस्त होती आशा की रेल |
भस्म बाती होती बिन तेल ||

स्वजन के बिंधते वाणी बाण|
निछावर करते परिजन प्राण ||
माँग से मिलता नही प्रयाण|
पापियों को मिलता निर्वाण ||

कर रहे लंपट सब पर राज |
तिमिर में सोया सभ्य समाज ||
रुंधे कंठो में’ रुकी आवाज |
कर रहे है हम फिर भी नाज ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9412224548

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