मै कवि हूँ

मै कवि हूँ  कुछ गान करूँगा |
जो न मिलेगा इस जीवन में उसका भी आह्वान करूँगा |
मै कवि हूँ कुछ गान करूँगा |

खोल ह्रदयपट अंतर्मन के जिसने सुंदर गीत जगाये |
तुफानो के झोंकों मे भी जिसने झूठे महल दिखाये|
मन मानस की विरह वेदना को जो दिल से समझ न पाये|
ऐसे सुन्दर किन्तु निठुर विधुबदनो का आख्यान करूँगा|
मै कवि हूँ कुछ गान करूँगा |

चातक कंठ सूख जाने पर जिसने कभी न जल बरसाया |
मोरों की सुन्दर कूकों से जिसने कभी न दिल बहलाया |
कृषको की सूखी खेती से जिसने कभी न प्रेम दिखाया |
ऐसे श्यामल किन्तु कुटिल जल मेघों का व्याखान करूँगा |
मै कवि हूँ कुछ गान करूँगा|

हरे भरे तरुओ की छाया जिसको कभी पसंद न आती |
शीतल मंद सुगंध पवन भी जिसके मन मंदिर को जलाती|
कोमल पुष्पों की कलिया भी जिसके उर को है सुलगाती|
ऐसी उज्जवल किन्तु अग्नि सी धवल धुप का ध्यान करूँगा |
मै कवि हूँ  कुछ गान करूँगा |

चकोरों की करुणामय तान जो सुनकर मुस्काता है|
वियोगी युगलों को जो देख-देख कर झुलसाता है |
सरो मे मुस्काते कमलों को भी जो मुरझाता है |
ऐसे निर्मल किन्तु ताप से विधु का मै सम्मान करूँगा |
मै कवि हूँ  कुछ गान करूँगा |

भिक्षुक को भिक्षा के बदले जिसने तोम्बी तोड़ दिया |
खिले हुए फूलो के तरु को जिसने जड से मरोड़ दिया |
बहती हुई प्रेम सरिता को जिसने उल्टा मोड़ दिया |
ऐसे भोले किन्तु क्रूर से प्रभु का मै  गुणगान करूँगा |
मै कवि हूँ  कुछ गान करूँगा |

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