जय, देवि, दुर्गे, दनुज गंजनि

जय, देवि, दुर्गे, दनुज गंजनि,
भक्त-जन-भव-भार-भंजनि,
अरुण गति अति नैन खंजनि,
जय निरंजनि हे।
जय, घोर मुख-रद विकट पाँती,
नव-जलद-तन, रुचिर काँती,
मारु कर गहि सूल, काँती,
असुर-छाती हे।
जय, सिंह चढ़ि कत समर धँसि-धँसि,
विकट मुख विकराल हँसि-हँसि,
शुंभ कच गहि कएल कर बसि,
मासु गहि असि हे।
जय अमर अरि सिर काटु छट् छट्,
गगन गय महि परत भट्-भट्,
खप्पर भरि-भरि शोषित झट्-झट्,
घोंटल घट-घट हे।
जय कतहु योगिनि नाचु महि मद्,
उठति, महि पुनि गिरति भद्-भद्,
रिपुर धुरिकत माँसु सद्-बद्,
गिरल गद्-गद् हे।
जय कतहु योगिनि नाचु हट्-भट्,
कतहु करत श्ाृगाल खट्-खट्,
दनुज हाड़ चिबाव कट्-कट्,
उठत भट्-भट् हे।

जय ‘छत्रपति’ पति राखु श्यामा,
हरखि हँसि दिल सकल कामा,
जगत-गति अति तोहरि नामा,
जगत-गति अति तोहरि नामा,
शंभु बामा हे।

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