दामिनी

दामिनी

दामिनी वेदना या कहो पीड़िता
नाम से दर्द की हद बदलती नहीं।

गाँव हो या शहर ‘औ’ गली पास की
बेटियाँ अब सलामत कहीं भी नहीं,
लाख आँचल तले माँ छुपा ले भले
कातिलों की नज़र तो लगी हर कहीं,

मांस का लोथड़ा भर हुई लड़कियां
नीयतें आदमी की संभलती नहीं।

उम्र या जिस्म के मायने हैं कहाँ?
लाज अस्सी बरस की ही रोंद दी,
रह गई है हवस की निगाहें फ़क़त
जो उगी थी अभी वो कली रोंद दी,

अस्मतें लुट रही हर घडी देश में
मौत क्यों मनचलों को कुचलती नहीं।

सिर्फ नापाक पुतले न पैदा करो
क्यों लगती नहीं मर्द पर सख्तियां?
यूँ रहो ये करो मत हँसो मत जियो
लड़कियों पर लगे लाख पाबंदियां,

क्रूरता की भयानक मिसालों से भी
क्यों समाजों की इज्ज़त दहलती नहीं ?

♦♦♦
रजनी मोरवाल,
अहमदाबाद
+९१९८२४१६०६१२

3 Comments

  1. admin चन्द्र भूषण सिंह 12/07/2013
  2. Ram Niwas Banyala 19/10/2013
  3. सुनील लोहमरोड़ Sunil Kumar Lohamrod 28/01/2014

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