पता ही नहीं चला

ख्वाबों की खुमारी कब उतर गई – पता ही नहीं चला
जिन्दगी भंगुर सी कब बिखर गई – पता ही नहीं चला

चाहता तो था कि छु लूँ मैं भी ऊँचाइयों को, मगर
कब पैरों तले ज़मीन खिसक गई – पता ही नहीं चला

मैं भी सोना चाहता था रात भर गहरी नींद यूँ ही, मगर
एक अन्जाने डर से कब नींद खुल गई – पता ही नहीं चला

हंस-खेलकर, मिलजुलकर, बिता दूँ ये छोटी सी जिन्दगी, मगर
जिन्दगी कब छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गई – पता ही नहीं चला

सोचता था हर पल गुजारूं इमानदारी से ता उम्र, मगर
कब, कहाँ, कैसे, क्यूँ नीयत बदल गई – पता ही नहीं चला

उठ जाये मेरी शख्सियत सबकी नज़रों में एक दिन, मगर
मेरी खुद की नज़र अपनी ही नज़रों में गिर गई – पता ही नहीं चला

जिम्मेदारियों का बोझ पड़ा कुछ इस तरह मेरे कांधों पर कि
जवानी कब आई और कब ढल गई – पता ही नहीं चला

चाहता था खुशी के हर पल को समेट लूं मैं, मगर
खुशियाँ कब सिमट कर रह गई – पता ही नहीं चला

जितनी थी चादर पैर भी उतने ही फैलाना चाहा था, मगर
पैरों की उँगलियाँ कब बाहर निकल गई – पता ही नहीं चला

पाला-पोसा, बड़ा किया, हंसी-ख़ुशी रिश्ता किया बिटिया का, मगर
शादी के तैयारिओं में कब आँख भर गई – पता ही नहीं चला

इश्क मोहब्बत प्यार क्या है, कभी समझा नहीं “चरन”, मगर
उसके साथ से जिन्दगी कब संवर गई – पता ही नहीं चला

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गुरचरन मेह्ता 

2 Comments

  1. Muskaan 29/05/2013
  2. Gurcharan Mehta 'RAJAT' GURCHARAN MEHTA 29/05/2013

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