मेरे मन..

मन्जिल निगाहो मे है फिर भी सब धुन्ध्ला सा लग रहा है,
हर बेजान जर्रे मे जीवन का एह्सास हो रहा है,
बिखरे सपनो के टुकडे समेट रहा है,
साथ चाहिये क्यो किसी का पर हर पल उसे अपना कहने से डर रहा है !! क्या तुझे अपने वजूद पे शक है, या फिर तु अपनी ही परछाई से भाग रहा है !!

क्यो तू अनकहे एह्सासो को बयान कर्ने से डर रहा है,
क्यो जीवन के सच को बदलने मे लगा है,
क्यो गैरो मे अपनो को तलाश कर रहा है !! क्या तुझे अपने वजूद पे शक है, या फिर तु अपनी ही परछाई से भाग रहा है !!

क्यो जिन्दगी से तुझको इतनी शिकायते है,
क्यो दर्द से तु बाहर नही निकल पा रहा है,
क्यो तुझपे अन्जाने रास्तो पे चलने का जुनून सवार है!! क्या तुझे अपने वजूद पे शक है, या फिर तु अपनी ही परछाई से भाग रहा है !!

क्यो तू दुनिया से तेज भाज रहा है,
क्यो तुझे हर शक्स अपना दुश्मन सा लगता है,
क्यो तेरी ख्वाहिशो क दम घुट रहा है !! क्या तुझे अपने वजूद पे शक है, या फिर तु अपनी हि परछाई से भाग रहा है !!

13 May 2013

2 Comments

  1. Gurcharan Mehta 'RAJAT' Gurcharan Mehta 13/05/2013
    • Muskaan 14/05/2013

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