तुम्हारा स्नेह

तन्हाइयों से टकरा कर,
आज बिखर-सी गई मैं !
रुत ने जो यूँ देखा मुझे,
दूर ही सहम-सी गई मैं !
वो तो तेरा साया था सिरपर,
जो हारकर भी जीत गई मैं !
“माँ” तुम्हारा स्नेह मुझे,
आजतक साहस देता रहा,
वर्ना इन आंधियो से घबराकर,
कब का टूट गई होती मैं !
वक़्त के बदलते मौसम में,
अपना अस्तित्व खो चुकी होती मैं !!

-श्रेया आनंद
(9th May 2010)

3 Comments

  1. neelam 14/05/2013
    • Shreya Anand Shreya Anand 23/05/2013
  2. babasaheb landge 'sarthi' 07/11/2013

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