कुछ शेर – गुरचरन मेह्ता

मैंने कह दिया तुमसे कि मैं अब कुछ न बोलूंगा
न तो पर्दा उठाउंगा ना ही कोई राज खोलूंगा
तुम्हारे साथ रहकर भी हुआ मुश्किल अब जीना
अकेला था, अकेला हूँ, अकेला ही मैं रो लूंगा

कभी इकरार करती है कभी इन्कार करती है
मोहब्बत है तुझे मुझसे, जमाने से क्यूँ डरती है
भरी महफ़िल में आ कर दे, इजहारे इश्क तू दिल से
मैं तुझसे प्यार करता हूँ, तू मुझसे प्यार करती है

समय की बात न कर तू समय तो बीत जाएगा
अभी तेरा समय है तू सभी से जीत जाएगा
तू किससे मुंह छुपायेगा, खुलेगा जब तेरा चिट्ठा
गिरेगा एक दिन ऐसा कि औंधे मुंह की खायेगा

कहीं मुस्कान होती है कहीं आंसू भतेरे हैं
कहीं गहरा समंदर है तो मौजों के थपेड़े है
कहीं सुख की भी वर्षा है, कहीं दुःख का है सुखा भी
ये तो कर्मों का लेखा है, तेरे है कि मेरे है

उंचाई पर है इन्सां कि, परिंदा उड़ नहीं सकता
के अपनी डाल पर पर भी वो तो वापस मुड़ नहीं सकता
करें क्यूँ बात हम हवा में उड़ते इन वाशिंदों की
अरे! इन्सान ही इन्सान से जब जुड़ नहीं सकता

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गुरचरन मेह्ता

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