मुझे अच्छा लगता है

सभी खुश हों, तो ही मुस्काना – मुझे अच्छा लगता है
उदास हो कोई, तो उसके दुःख में दुःख जताना – मुझे अच्छा लगता है

वादा करतें हैं लोग और तोड़ देते हैं, पर
वादा करना ओर फिर निभाना – मुझे अच्छा लगता है

गल्तियाँ करने के बाद नजरें चुरातें है सभी अक्सर
पर गल्ती होने पर उसे मान जाना – मुझे अच्छा लगता है

चुप-गुमसुम- उदास-अकेला, क्यूँ काटू जिदगी
अरे! भाई, लोगों से मिलना-मिलाना – मुझे अच्छा लगता है

राह में उनकी फूल बिछाना मुझे कतई पसंद नहीं
पर उनके रास्ते से कांटे हटाना – मुझे अच्छा लगता है

बीवी संग करता हूँ बाते हमेशा मैं बड़ी बड़ी
पर साली संग छुट-पुट बतियाना – मुझे अच्छा लगता है

ससुराल जाना पड़ता है न चाहते हुए भी अक्सर मुझे
मेरा बेटा कहता है कि मेरा नाना – मुझे अच्छा लगता है

रोज, मोहल्ले की नई कहानी सुनकर गुस्सा आता है
पर लैला-मजनू का वो किस्सा पुराना – मुझे अच्छा लगता है

वैसे तो झूठ भी, सच की तरह कहता हूँ मैं
पर कभी-कभी खुद को भी, दर्पण दिखाना – मुझे अच्छा लगता है

कहते हैं कि उसने चोंच दी है तो दाना भी देगा
पर पहले कमाना, फिर खाना – मुझे अच्छा लगता है

आओ पुरानी बातों को भूलकर आगे बढ़े
कुछ नया करें, ये नया जमाना – मुझे अच्छा लगता है

जब भी बात होती है मेरे वतन की कहीं, तो
“सारे जहाँ से अच्छा” गीत गुनगुनाना – मुझे अच्छा लगता है

मशीनों की तरह हो चुकी है यह जिन्दगी हमारी
बापू का वो चरखा चलाना – मुझे अच्छा लगता है

यूँ तो झुका नहीं किसी के भी आगे कभी “चरन” मगर
इण्डिया गेट पर नतमस्तक होकर शीश झुकाना – मुझे अच्छा लगता है 

________________________________________________

गुरचरन मेह्ता

3 Comments

  1. Muskaan 06/05/2013
  2. Gurcharan Mehta 'RAJAT' गुरचरन मेह्ता 06/05/2013
  3. Dharmendra Sharma 08/05/2013

Leave a Reply