यह जीवन की एक त्रासदी ही है….

यह जीवन की एक त्रासदी ही है ,
जहां हम जीते जी
मर रहे है और
हर रोज़ अपने अन्तर्मन को मार रहे है |

हम अपनों के बीच
पराये बन कर खो गए |
हम अपने लक्ष्य को भूल गए ,
अपनी मानवता को खो दिया |
प्रगति की उड़ानों में
हम हर रोज़ एक नयी मौत मर रहे है |

एकबार सोचे
आपस में जुड़ने का माध्यम तो बहुत है ,
जो आसानी से एक दूजे से हम जुड़ गए
लेकिन यह भी सच है की ,
हम आपस में बहुत कम जुड़े |

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