सावन मास बहे पुरवइया।

(1)

सावन मास बहे पुरवइया।

बछवा बेच लेहु धेनु गइया।।
(अर्थात् यदि सावन महीने में पुरवैया हवा बह रही हो तो अकाल पड़ने की संभावना है। किसानों को चाहिए कि वे अपने बैल बेच कर गाय खरीद लें, कुछ दही-मट्ठा तो मिलेगा।)

(2)
शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।

तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।।
(अर्थात् यदि शुक्रवार के बादल शनिवार को छाए रह जाएं, तो भड्डरी कहते हैं कि वह बादल बिना पानी बरसे नहीं जाएगा।)

(3)
रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय।

कहै घाघ सुन घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।।

(अर्थात् यदि रोहिणी पूरा बरस जाए, मृगशिरा में तपन रहे और आर्द्रा में साधारण वर्षा हो जाए तो धान की पैदावार इतनी अच्छी होगी कि कुत्ते भी भात खाने से ऊब जाएंगे और नहीं खाएंगे।)

(4)
उत्रा उत्तर दै गयी, हस्त गयो मुख मोरि।

भली विचारी चित्तरा, परजा लेइ बहोरि।।

(अर्थात् उत्तरा और हथिया नक्षत्र में यदि पानी न भी बरसे और चित्रा में पानी बरस जाए तो उपज ठीक ठाक ही होती है।)

(5)
पुरुवा रोपे पूर किसान।

आधा खखड़ी आधा धान।।

(अर्थात् पूर्वा नक्षत्र में धान रोपने पर आधा धान और आधा खखड़ी (कटकर-पइया) पैदा होता है।)

(6)
आद्रा में जौ बोवै साठी।

दु:खै मारि निकारै लाठी।।
(अर्थात् जो किसान आद्रा नक्षत्र में धान बोता है वह दु:ख को लाठी मारकर भगा देता है। )

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  1. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 10/12/2015

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