अन्धकार में हैं जीवन सारा

अन्धकार में हैं जीवन सारा
पथ ओझल है, लक्ष्य कठिन है
क्षण लघु है, संघर्स अधिक है
ढूंढ रहा हूँ प्रजवलित दीप ज्वाला
अन्धकार में है जीवन सारा

सकुच मन है स्थिर मंशा
सुख कम है दुःख अधिक
जीवन स्थिर काल अधिक
है विपदा सामने खडी
लिए समस्याएं बडी
कैसे हल कर दूं समीकरण है पुराना
अन्धकार में है जीवन सारा

क्योँ आती है परिथितियाँ ऐसी ?
क्योँ रहती है चित्त में उदासी ?
हल करके दिखलाना उसको
चाँद में ध्वज फहराना उसको , परन्तु
जकड़ा है जीवन भ्रांतियों में कैसे
दृष्टीगोचर है पथिक ऐसे
चिंतन में है उदास मन सार
अन्धकार में है जीवन सारा

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