कुछ तो सच बोल दूँ

जाम लाने में क्यूँ इतनी देर हो गयी ।
क्या पिलाओगे तब जब हम मर जायेंगे ।।
मस्त आँखों से न देखो हमें इस तरह ।
फिर न कहना जो हद से गुजर जायेंगे ।।

इश्क के इस सफ़र में मंजिले ढूंढते।
कुछ चढ़ जायेंगे तो कुछ उतर जायेंगे ।।
और क्या-क्या बताएं इश्क के रास्ते ।
कुछ इधर जायेंगे – कुछ उधर जायेंगे ।।

मेरे सपनो का दर्पण तोड़ कर रख दिया ।
क्या-क्या सोचा था वो, दिल में अगर आयेंगे ।।
आखिर खुल ही गया मुझ पर उनके दिल का राज ।
अब वो अपनी ही बातों से मुकर जायेंगे ।।

सरे महफ़िल में हम तुमसे रुसवा हुए ।
हम बिगड़े ही कब थे जो सुधर जायेंगे ।।
प्यार की डगर में अगर-मगर तू न कर ।
वरना कैसे तुझे हमसफ़र पायेंगे ।।

हमारा पीछा न छोड़ेंगी यादें तेरी ।
इस जहाँ में सनम हम जिधर जायेंगे ।।
तेरा संग न मिला जो, ओ संगदिल सनम ।
तो कांच के टुकड़ों से हम बिखर जायेंगे ।।

जाते जाते मन कहे कुछ तो सच बोल दूँ ।
पर क्या सच का सामना हम कर पायेंगे ।।
मन में क्या क्या भरा, दिल के भेद खोल दूँ ।
वर्ना किस मुहँ से खुद के घर जायेंगे ।।
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गुरचरन मेहता

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