अग्नि शय्या पर सो रहे हैं लोग

अग्नि शय्या पर सो रहे हैं लोग
किस कार्ड सर्द पड़ चुके हैं लोग

तोडना चाहते हैं अमृत फल
जहर के बीज बो रहे हैं लोग

मंजिलों की तलाश है इनको
एक दर पर खड़े हुए हीं लोग

कापते हीं सड़क पे सर्दी से
बंद कमरों में खौलते हैं लोग

स्वर्ग से अप्सराएँ उतारी हैं
स्वप्न भी खूब देखते हैं लोग

खुद इन्हें भी खबर नहीं इसकी
किन दिशाओं में चल पड़े हैं लोग

मन को मन के निकट नहीं लाते
देह पर देह थोपते हैं लोग

कैसी बस्ती है ‘एहतराम’ यहाँ
मर रहे हीं न जी रहे हैं लोग

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