दिल्ली की हैवानियत

क्योँ कोई हो सकता है, इतना निष्ठुर
क्योँ करता है ऐसी हैवानियत
जिसकी गाथा होती थी अविरल
जहाँ जन्मे सम्राट अनेकों, आज
होता है ऐसा हाल उसका
सुना था नाम इन्द्रप्रस्थ नगरी है नृप राजाओं कि
लगता है मिथ्या अब सब , है दिल्ली हैवानो कि
लुटती है अस्मत देवी और दामिनी कि
सोता है शासन स्थिर है प्रशासन ,
आँखों में पट्टी बांध न्याय यहां पर होता है
होकर के बारी जहाँ पे कैदी चैन से सोता है
कहते हैं सब दिल्ली है दिलवालों की,
न दिल्ली है दिवालों की न है सम्राटों की
दिल्ली है हैवानों और शैतानों की

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