दिल्ली का दुराचार

दिल्ली की पहचान पुरानी  गौरवमय है कथा –सुहानी.

एक से बढ़कर कई किस्से है ,हर युग में है इसकी कहानी  .

अब दिल्ली बन गया है दाग,दहसत की लग चुकी है आग.

बच्चे    बूढ़े  लोग  तमाम , झुलस  रहे है   इसमें आज .

दिल्ली   का  वो   दुराचार, देश  में  मचाया  हाहाकार.

जीवन को  भी रोंदा  उसने ,दामन को किया था तार –तार .

वो मौत  हुई  अपघात  हुई ,उस पशु –वृति से आघात हुई.

मन -बीमार मस्तिष्क विकार से ,जन – जीवन  अवसाद  हुई .

जो सृष्टि  थी  इतनी  सुहानी, क्यों दृष्टि  बन गयी  घिनोंनी.

दैहिक भूख क्या इतनी प्रबल है,जो  कर  देती   बातें  अनहोनी .

ऐसी  सोच  ऐसी  मानसिकता, शिक्षित-जन की यही है क्षमता.

दुष्प्रवृति   वो  क्यों  अपनाते , विवेकहीन  जगती क्यों  इच्छा .

स्थूल  शरीर  तो जाता जहाँ  से, आत्मा  ही  रोती  यहाँ   पे.

और  भी  ना हो  ऐसी  दशाएं  ,चीख –चीख  कर  कहती  सबसे.

ओ  नराधम  अब  तो  जागो, इस रक्त –पंक दलदल से भागो.

नर पिशाच बन क्यों जीते हो , बन  फ़रिश्ता  स्नेह  जगा   दो .

पापी   बनकर    जाने   वाले  , थोड़ा  पुण्य तो कर  के  जाओ.

मरना    तो   तुमको   भी  है, कुपथ –पथ  पर  अब  ना  आओ .

भारती दास

2 Comments

  1. Sunil Kumar Das 20/04/2013
  2. यशोदा 21/04/2013

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