दुश्मन की झोली

गम जो आ जायें जो जिन्दगी में तो वो भी मुस्कुरा कर चल देते हैं,

क्योंकि शब्दों की कुंची से हम जिन्दगी में रंग भर देते हैं .

घुस आये जो कोई आशिक मिजाज गली में हमारी तो सच कहता हूँ ,

कब्र में पैर हैं जिनके, खड़े होकर वो दद्दु भी,  दो-चार धर देते हैं .

खासियत है मेरे वतन के लोगों की मानों या न मानों,

आ जाये जो बात वतन की तो झुकते नहीं कटा हम सर देते हैं .

भुल न जाना सन 71 की लडाई और कारगिल का युद्ध ,

नोच लेते  हैं हम आँखें दुश्मन की और पर कतर देते हैं .

कमजोर समझने की भुल न करना हमें ऐ दुनिया वालों,

जान लेने का रखते है दम वतन के लिये जान अगर देते हैं .

और बन कर दुश्मन जो चाहता है दुनिया उजाड़नी हमारी,

हम बना कर दोस्त उसे अपना झोली उसकी खुशियों से भर देते हैं .

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गुरचरन मेह्ता

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