आज फिर उसने बेरुखी की है

हर घडी जिसकी बंदगी की है !
आज फिर उसने बेरुखी की है !!

कौन हँसकर जहर पियेगा यूँ !
जिस तरह मैने मयकसी की है !!

आज फिर उस गली से गुजरा हूँ !
आज फिर मैने खुदखुशी की है !!

बेचकर के जिगर के टुकडे को!
दूर इक माँ ने मुफलिसी की है !!

चाँद तारों से फासले हैं फिर !
किसने आँगन में चाँदनी की है !!

ना चरागों की आरजू की मैंने !
दिल जलाकर के रोशनी की है !!…..प्रदीप अवस्थी “शाद”

2 Comments

  1. Muskaan 22/04/2013
    • pradeep awasthi 22/04/2013

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