मन्जिल मिल गयी

पाना था उसको था जीवन में कुछ बांकी
जैसे ज्येष्ठ में थी शर्दी सी ठंडी
जाने कैसे कहाँ बात हो चली
ठहरते ठहरते राहों में आखिर मंजिल मिल गयी

थे उतार चढ़ाव अनेको दिक्कत पारेशानियाँ
ढून्डता  था रात में फूलों की कलियाँ
नदियों की लहरे मुड़ कर अचानक रुक गयी
ठहरते ठहरते राहों में आखिर मंजिल मिल गयी

आ रहीं थी खुशियाँ सारी हो रहा था उदय रवि
कह रहा था बढ़ निरंतर रह तू लक्ष्य में अडिग
बीती वर्षा शरद मुसुकाई कास के फूलों में अजीब सी हंसी छा गयी
ठहरते ठहरते राहों में आखिर मंजिल मिल गयी

हुआ था सवेरा चाँद हो चूका था धुंधला
उग रहा था दिवाकार करने आकाश में उजाला
धरा में बचपन निहारकर फिर याद मा की आ गयी
ठहरते ठहरते राहों में आखिर मंजिल मिल गयी

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