तू जा रहा परदेस…

अपनी माटी की गंध छोड

सनातन बंधे संबंध तोड

अपनी नौका को अलग मोड

तू जा रहा परदेस…

माँ के आँचल की तज छाया

भूला वह बचपन की आया

स्वदेश को अपने कर पराया

तू जा रहा परदेस…

वसंत कोकिल का गीत छोड

स्वार्थ के अर्थ का लगा होड

वह सुंदर वीणा को मरोड

तू जा रहा परदेस…

अपनी मेदिनी को भूलाकर

सम्पत्ति के मद मे डोलकर

भावनाओं में विष घोलकर

तू जा रहा परदेस…

पंछी पंख गगन तक तक वितान

भर वियोग की विशाल उडान

सबकी आँखों मे भर उफान

तू जा रहा परदेस..