ओस में धुलकर, रोशनी में घुलकर

ओस में धुलकर, रोशनी में घुलकर

मखमल का चोला है आई पहनकर

चकाचौंद चारों दिशाओं में छाई

बिखरे है मोती धरती पिघलकर

 

अधखुले गुलाब दामन से लिपटे

तितली के पंखों के नाजुक से छींटे

बेबाक खुशबू को जी भर के पीके

मदहोश भंवरें सपनों में जीते

 

आधी जगी सी चिडिया की करवट

पत्तों में हल्की सी मासूम शरारत

वो रात अब तक गुज़री कहां है

नज़रों में अब भी है मीठी शिकायत

 

ऐसी सुबह का रंगीन आलम

बादलों की राहें कोमल मुलायम

ऐसे में तुम अब आए तो अच्छा

न आए तो बेहतर, न बहके कहीं हम

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