यादों का शिकार

असमंजस परिस्थिति-का एहसास,
दिल में ये र्दद कब उठा ?
कब शरीर का एक-एक हिस्सा,
ज़मकर बेज़ान होने लगा?
अब जख्मीं हालात मे;
आगे धूप से तप्ते पल,
पत्थरों के जंगल में,
दुर्लभ छाँव भी..!
विस्मृत-सा,थका देह-पिंजर,
दिल मे ववंडर सा उफ़ान ,
दिल की नाव मझधार
मैं अनुभव हीन
अनजान यादों का शिकार

सजन कुमार मुरारका

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