कोरे काग़ज पर नाम

कोरे काग़ज पर लिख डाला मैंने नाम तुम्हारा,
मौसम बनकर डोल रहा है पीड़ा का हरकारा |

बदली उड़ती फिरे बावरी बूँदों को लहराके
सावन में तरसाई अँखियाँ पथ प्रियतम का ताके,
बहते आँसू ठिठक गए हैं आँचल बना सहारा |

फूल-फूल पर व्यथा लिखूँ ओ’ मधुकर से भिजवाऊँ
मन ये चाहे पंख लगाके संग पवन उड़ जाऊँ,
साजन मेरा बना पहेली बूझ – बूझ मन हारा |

दिन ज्यों सूखी बंजर धरती मरुथल जैसी रातें
साथ कुसुम के पाई मैंने काँटों की आघातें,
खेत गाँव सुधियों के आँगन जाकर तुम्हें पुकारा |

 

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  1. सुनील लोहमरोड़ Sunil Kumar Lohamrod 28/01/2014

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