अभी माहौल भारी है

उससे कहूँगा आज-

कल तक मेरे मुँडेर पर
अक्सर जो आती रही है
मीठे गीत गाती
चूँ-चूँ करती
एक चिड़िया!

न जाने क्योँ?
उसकी ये चहचहाट
जानी-पहचानी सी
लगती हे
कुछ पहले की सुनी हुयी
मगर
एकदम ताज़ी।

मेरी चिड़िया!
ज़रा बच के निकलना
अभी माहौल भारी है।

हज़ारोँ
गिद्ध सी नज़रेँ
तुमपे टिकते देखा हूँ।

और कल
व्योम में
कोई शिकारी
अपना ज़ाल
फैला रहा था।

तब तक
मेरे घर मेँ
जहाँ चाहे रह लो

रोशनदान,मचान या
जहाँ चाहे
मेरी किताबोँ की
आलमारी मेँ भी

तुम कहीँ भी
बीट करना
कुछ न बोलूँगा

तुम्हेँ पिँजरेँ मेँ
रखनेँ की नीयत
कभी न रखूँगा।

तुम्हेँ जब भी जी चाहे
घोँसले सहित
उड़ जाना
मना न करूँगा।

मगर
तब तक रुको
जब तक कि-
माहौल का भारीपन
कुछ कम नहीँ होता।

शुभम् श्रीवास्तव ‘ओम’

3 Comments

  1. vanshika namdev 13/04/2013
    • शुभम् श्रीवास्तव 'ओम' Shubham Srivastava 14/04/2013
  2. Raj Mangal Pandey 14/04/2013

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