धनकुटनी

धान कूटती फुलबतिया
समाठ की हर चोट पर
उखल में समय कूटती है
चोट की ताल पर
कुछ गुनगुनाती है
दर्दीले स्वर में
मरद के खोने की बात सुनाती है

पैसा कमाने उसका मरद
पांच साल पहले परदेस गया
न पैसा भेजा, न चिट्ठी भेजी
बताये पते पर जब ढूंढने पहुंची
पता चला उसे
उसका पति वर्षों पहले
उस शहर को छोड़ चुका था
कोई और ठिकाना जोड़ चुका था

आज भी
बिना पता वाले पोस्टकार्ड का
वह रोज इंतज़ार करती है
गांव के सीमान से गुज़रती
रेल लाइन पर
शहर को जाती ट्रेन का धुआं
रोज़ निहारती है

इसी उम्मीद में
मालिक की हवेली पर
वह रोज़ समाठ से समय कूटती है
टुकड़ों में कुछ आंसू
कुछ उम्मीद जीती है
अपनी अधखुली चोली पर
मालिक की फिसलती निगाह
चुपचाप सहती है
अब ऊखल में कुटे
बस दो मुट्ठी धान
उसकी फटी धोती
का ईमान है।

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