वह ‘मरनी’

जंगल की आग से
जन्मी है एक औरत
सुर्ख़ होती है
अख़बार के फलक पर

स्याही की बूंद
और कलम की नोंक पर
वह जुगनू-सी
चमकती है

पर्चों पर उगती है
तलवार
बार-बार
तराशने गर्दन उसकी

किन्तु लहू ढलकती स्याही
नोंक पर चढ़ाती है ‘सान’
काटती है तलवार
मरते-मरते
वह फिर जी जाती है
किन्तु वह
‘मरनी’ कहलाती है।

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