ग़जल

इश्क मे कभी कभी रुस्वाई भी होती है

 होती संगम तो कभी तनहाई भी होती है
कभी होते कोइ पागल दिवाने इश्क मे
तो और कहिँ कइ  हर्जाई भी होती है
 इझहारें इश्क की नौबत अजिब है यारों
 होती है इकरार तो कभी लडाई भी होती है
अपनो से मिली जख्म होती बडी मुस्किल
जख्म भरनेवाली कभी पराई भी होती है
दिल तोड ने वाले भी बहुत है महफिल मे
मोहब्बत जताना उन्हे सिखाई भी होती है
हरि पौडेल

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