ग़ज़ल (दीवारें ही दीवारें)

दीवारें ही दीवारें नहीं दीखते अब घर यारों 
बड़े शहरों के हालात कैसे आज बदले है. 

उलझन आज दिल में है कैसी आज मुश्किल है 
समय बदला, जगह बदली क्यों रिश्तें आज बदले हैं 

जिसे देखो बही क्यों आज मायूसी में रहता है 
दुश्मन दोस्त रंग अपना, समय पर आज बदले हैं 

जीवन के सफ़र में जो पाया है सहेजा है 
खोया है उसी की चाह में ,ये दिल क्यों मचले है 

समय ये आ गया कैसा कि मिलता अब  समय ना है 
रिश्तों को निभाने के अब हालात बदले हैं 

ग़ज़ल  प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना  
 

One Response

  1. Bharti Das bharti 08/04/2013

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