कविता का प्रवाह

मैं हैरान हूं
परेशान हूं
सोच में डूबा हूं
क्या करूं
कविता करूं?
पर यह लगता
संभव नहीं
कविता मुझसे
गढ़ती ही नहीं
क्योंकि
कविता तो
आवेग त्वरित
कालयात्री है
मैं उसका
कर्ता नहीं,
धर्ता नहीं
पिता नहीं
धाता नहीं
वह तो विश्व शास्त्री है
गहन, गम्भीर
छाया आगमिष्यत के लिए
वह जनचरित्री है
नये अनुभव
नये संवेदन
नये अध्याय
नये प्रकरण
से जुड़ वह
जगमगाती है
कविता है फूटती
कई तरह से
उसका रंग
एक नहीं होता
कहीं छटपटाहट
कहीं आक्रोश
कहीं रति
कहीं व्यंग्य
है अपना
प्रभाव छोड़ता
कविता एक
पराक्रम है
अस्तित्व का सच है
वह मौन नहीं
मात्र सहिष्णुता नहीं
दुहिता भी नहीं
वह है
वाणी का आक्रमण
वाणी का विस्फोट
कविता
परम स्वाधीन है
मूलतः
आत्म संवाद है
एक प्रमेय है
जिज्ञासाओं की
अनन्त पर्तों को
उजागर करने वाला
शाश्वत प्रवाह है
कविता एक कवच है
मेरे होने जैसा सच है
वह एक घटना है
उपस्थिति है
शब्द और अर्थ के
परस्परधर्मी
चारुत्व से युक्त
अभिव्यक्ति है
सहज प्रवाह है
जो भीतर की कठोर
चट््टानों को तोड़
निकल आती है
ज्वालामुखी के लावे सम
दहकती आती है
खुद-ब-खुद
कागज पर
बहती आती है
और चाहती है
अस्मिता से जुड़े
गंभीरतम सत्यों
का संधान
वह चाहती है
हमारे सपनों
हमारी स्मृतियों को
अपना दूध पिलाकर
हमेषा के लिए
सुरक्षित कर दे
संरक्षित कर दे
हमारे भीतर का
जो कुछ भी
कोमल है
उत्कृ्रष्ट है
मधुर है
प्रांजल है
इसलिए अब मैं
निश्चिन्त हूं
हैरान नहीं हूं
परेशान नहीं हूं
सोच में डूबा नहीं हूं
क्योंकि मैं जान गया हूं
कि कविता
शिल्पगत अभ्यास नहीं है
वह तो एक
सहज प्रवाह है
जो अपने आप आता है
फिर चला जाता है
और कागज के
रेतीले मैदान पर
छोड़ जाता है
कुछ सीप
कुछ शंख
कुछ मोती जैसी
कवितायें।

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