‘जागे दिल्ली आज’: कुंडलिया

सच्ची कुंडलिया सुनें, देखें सारे बिम्ब.

बन्दर-बिल्ली एक हैं, एक आज अवलंब..

एक आज अवलंब, ‘खाप’ को भान करा दें,

अन्यायी को याद, छठी का दूध दिला दें,

थर-थर कांपें लोग, तोड़ते कलियाँ कच्ची.

जागे ‘दिल्ली’ आज, कहे कुंडलिया सच्ची..

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