‘ठगे गए हम लोग’ : कुंडलिया

खोया प्यारा गाँव है, खोये हैं आधार.

नहीं रही वह सभ्यता, नहीं रहा वह प्यार.

नहीं रहा वह प्यार, शहर ने सब कुछ निगला.

विषय वासना रूप, वमन कर विष ही उगला.

पनघट पीपल प्यार , पुराना खोजें गोया.

ठगे गए हम लोग, देख अपनापन खोया..

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