‘होली’ : सार/ललित छंद

भाँग चढ़ाये रंग जमाये, मादक चले बयारी.

छंद-छंद के पुष्प खिले हैं, सजी हुई फुलवारी..

भाँग चढ़ाये रंग जमाये, रंगे साथी संगी.

तरह तरह के रँग दिखाता, जीवन है बहुरंगी..

भाँग चढ़ाये रंग जमाये, मिला न रँग में पानी|

सूखे रंग सभी को भायें, पिचकारी क्यों तानी?

भाँग चढ़ाये रंग जमाये, कहती दुनिया सारी.

राधा-कान्हा खेलें होली, पिचकारी ही मारी..

भाँग चढ़ाये रंग जमाये, यौवन रूपी  हाला.

होली में जो रंग जमा दे, वो ही है दिलवाला ?

भाँग चढ़ाये रंग जमाये, राग-फाग ही गायें.

रँगें रँगायें एक दूजे को, जमकर धूम मचाएं,,

भाँग चढ़ाये रंग जमाये,  कितनी चतुर सयानी.

भंग पिलाकर लड्डू लूटे , दुनिया है दीवानी.

भाँग चढ़ाये रंग जमाये, रंग जमा दें गा के.

अंगड़ाई लें चूहे कूदें, पेट भरें कुछ खा के..

भाँग चढ़ाये रंग जमाये, मत कर जोरा-जोरी

रँग डालेगी सबको फ़ौरन’ बहुत कड़क है छोरी..

भाँग चढ़ाये रंग जमाये, महक रही अमराई.

रंगों का त्यौहार अनोखा, सबको बहुत बधाई..

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