‘ उसकी ही कहिये’ सांगोंपांग/सिंहावलोकन घनाक्षरी

कहिये ये  घनाक्षरी, रस से जो हरी भरी,
सांगोपांग शब्द-शब्द , कहते ही रहिये.
रहिये सदा प्रसन्न, घरवाली तन्न भन्न,
देती रहे दन्न दन्न, सिर-माथे गहिये.
गहिये ये नेह ज्ञान अपना उसे ही जान,
सासू जी का है विधान, जो भी कहें सहिये.
सहिये उसी की आज, पूरा तभी होगा काज,
भूल जाएँ निज लाज, उसकी ही कहिये..

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