‘व्यंग्य कुंडलिया’

 

(१)

चोरी यद्यपि पाप है, चोरी है अपराध.

फिर भी चोरी कीजिये, ऑफीसर को साध.

ऑफीसर को साध, चलेगी रिश्वतखोरी.

बिजली पानी टैक्स, कीजिये जमकर चोरी.

चोखा है यह काम, भरें नोटों की बोरी.

बना लीजिए संघ, साथ मिल करिये चोरी..

(२)

घोटाला ही कीजिये, मत डरिये सरकार.

पकड़ेगा कोई नहीं, जन्मसिद्ध अधिकार..

जन्मसिद्ध अधिकार, कमीशनखोरी अपना.

मारें लंबा हाथ, तभी पूरा हर सपना.

यदि ‘अम्बर’ फँस जाय, नोट खोले हर ताला.

शत पीढ़ी कल्याण, करे पावन घोटाला..

(३)

गाड़ी-बँगला कीमती, दोनों में हो प्यार.

भाई जी अपनाइए, खुलकर भ्रष्टाचार.

खुलकर भ्रष्टाचार, यहाँ है कहाँ बुराई.

बहुमत में जो आज, सभी अपने ही भाई.

इस ‘अम्बर’ को छोड़, व्यंग्य करता यह कंगला.

कुचल आत्मा डाल. तभी हो गाड़ी-बँगला..

(४)

आरक्षण ऐसे भला, जैसे मिड डे मील.

आगे इसे बढ़ाइये, फिर करिये गुड़ फील .

फिर करिये गुड़ फील, सभी को करें इकठ्ठा.

जो भी करे विरोध, सहे अब लट्ठमलठ्ठा.

अपना ही हक साध, करे सबका क्या भक्षण?

है सामाजिक न्याय, परम पावन आरक्षण..

(५)

हरित-वाटिका में सुनें, सीत्कार औ आह.

गुत्थमगुत्था हैं कई, हो गन्धर्व विवाह.

हो गन्धर्व विवाह, मिलेंगें सुविधाभोगी.

नोट बिछाए गोट, बने रक्षक सहयोगी.

‘अम्बर’ अब मत देख, दिखेंगें काम-कामिका.

नित्य यहाँ मधुपर्व, घूम लें हरित-वाटिका..

(६)

केसरिया परिधान लख, नेताजी बेचैन.

राजनीति कैसे चले, चिंतातुर थे नैन.

चिंतातुर थे नैन, देख इसको पहचानो.

दिखे देश का भक्त, इसे आतंकी मानो,

धारा लगा  अनेक, बाँध पैरों में सरिया.

चाहे हो निर्दोष, लाल कर दो केसरिया..

(७)

रोजी-रोटी अन्न-जल, सब दे भारत देश.

फिर भी दिल में पाक ही , रुचता है परिवेश.

रुचता है परिवेश, ग़ज़ब की तैयारी है.

नहिं थाली में छेद, नहीं यह गद्दारी है.

‘अम्बर’ है बदनाम, नेक नीयत भी खोटी?

कर विदेश में काम, मिलेगी रोजी-रोटी..

 

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