‘मत्तगयन्द सवैया परिभाषा/वंदना’

 

सातहु भानस ले गण ‘अम्बर’ दो गुरु अंतहिं मत्तगयन्दा.

ये मतवाल गयंद क चाल मनोहर चौपद रूप सुनंदा.

अंतिम को दुहराइ पढ़े जब सिद्ध हो नाम सवाइ अनंदा.

शारद होत प्रसन्न सदा रसपान करैं कवि कोविद वृंदा..

 

पावन छंद जु मत्तगयन्द सु वंदन सादर हे जगमाता.

बालक मैं मतिमंद तिहार न छंद क ज्ञान मुझे जगमाता.

सत्य कहे मन मातु सती यह लोक चले तुमसे जगमाता.

मातु करें कछु आज दया सुर भाँतिहिं मानव ऐ जगमाता..

 

नैमिष धाम बने मन मंदिर मोहक छंद अनूप सुहाए.

वंदन मातु तिहार करूं नित भक्ति बढ़े मन आशिष पाए.

कालजयी रचना उपजे नित पाठ करे जियरा हरषाए.

‘अम्बर’ पुत्र तिहार हिं मातु सुकर्म करे परिवार चलाए..

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