जड़ें

मंज़िले अक्सर होती दूर,
रास्ते कांटों से बोझिल, सपनीली गलियों से,
सतरंगी आसमान सुहाना लगता है,
कचचे परों को खोल, उड़ने की चाह लिए,
बढ़ता है मंजिल की तरफ,
अनजानी राहों पर एक नया भटकाव लिए।
जान नहीं सकता कल को,
पर उड़ान भर लेता है,
नहीं जानता जाने किस ठोर, श्येन
कोई धार लेगा तलाश पूरी होगी न नीड़ की,
पर कोई अचानक कतार देगा।
लिए चाह आगे उड़ने की, छोड़ नीड़ को देता है,
पछताता है तब जब पांव धरातल चाहता है,
उस वक्त समन्दर की लहरों से, होकर भयभीत,
याद कर ममता की प्रीत,
पुनः पुरानी पटरी पर,
उस मधुर शीतल दुपहरी में,
तप्त शीत की मसहरी पर,
लौटने को ज़ोर लगता है,
पर गुजर गया जो वक्त,
छूट चुकी जो राह प्यार की,
ममता भरी मीठी दुलार की, गोद नहीं वो पाता है।
थक कर चूर, अपनी जमीं से दूर,
क्षार लहरों में मरने को मजबूर,
तड़प-तड़प देता दम तोड़, क्या यही है ?
जीवन का निचोड़,
मारना क्या नीड़ को छोड़ ?
अपनी जड़ों को तोड़ ?

मनोज चारण
मो. 9414582964

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