इंसान आज कल कुछ ज्यादा बदल गया है

कच्चे घड़े है बच्चे,उनकी खता ही क्या है
है संस्कार क्या ये माँ बाप को पता है

सुनसान हो डगर तो चलना संभल संभल के 
इंसान आज कल कुछ ज्यादा बदल गया है 

सूरज की रोशनी से जग का मिटे अँधेरा 
मन का मिटे अँधेरा सूरज किधर छुपा है 

जनतंत्र लग रहा है कंकाल तंत्र जैसा 
शासन से सुरक्षा के बदले में भय मिला है 

पतझड़ के बाद मौसम कुछ इस कदर से बदला 
आया बसंत कब और कब ये चला गया है 

जिनको गले लगाया वो पड़ गए गले ही 
तब प्यार बांटना भी लगने लगी खता है 

कहने को साथ अपने है कायनात सारी 
फिर भी पता नहीं क्यों ये मन जुदा जुदा है

One Response

  1. mahendra gupta 30/03/2013

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