आत्मशोध

मैंने स्वयं एक चक्रव्यूह रचा है
मैंने स्वयं अभिमन्यु की भूमिका अदा की है
मैंने स्वयं ही जयद्रथ बन
अपने अभिमन्यु की हत्या कर डाली
और मृत्यु से पहले
अपनी वसीयत भी बना डाली
कि
मैं नहीं चाहता
कोई अर्जुन मेरे लिए
किसी कृष्ण के पास जाए
और कोई कृष्ण
किसी नकली अभिमन्यु का दर्शन कराए
क्योंकि मैं नहीं चाहता
किसी अर्जुन के सामने किसी द्रौपदी का चीर
कोई दुश्शासन खींच डाले
और धर्म के नाम पर
अर्जुन सिर झुका डाले
और पांच वीर के सामने
एक नारी विलाप करे
फिर धर्म उस वक्त कहां गया था
जब द्रोण मारे गये थे
जब पितामह की हत्या हुई थी
और जब पराजित भीम ने
दुर्योधन पर ग़लत गदा मारी थी

उत्तर तुम्हारे कृष्ण भी नहीं दे सकते
उत्तर व्यास ने भी नहीं दिए हैं

उत्तर तुम्हें मुझसे लेना है
मैं जा रहा हूँ
नये सूर्य का निर्माण करने।

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