अश्वत्थामा बन भटकता हूं-

अश्वत्थामा बन भटकता हूं-
माथे पर लेकर उनके आरोपों का घाव-
घूम रहा हूं,
यहां वहां,
जहां भी जाता हूं,
माथे से रीसता वह घाव,
याद दिलाता है,
उन आरोपों की,
जो सच था ही नहीं।
आपसे मांगा जाएगा हिसाब-
उन तमाम पलों का,
जो आपने खर्चे हैं दफ्तर में,
एसी की ठंढ़ी हवा,
पेन- डायरी जो मिले थे।
लगा दिया जाएगा आरोप-
आपने अंदरूनी सूचनाओं को लगाया बाहरी हवा,
कि लचर हैं आप,
यह सब होगा आपके जाने के बाद,
अचानक यूं ही।
आपकी कुर्सी पर विराजमान भरेगा हूंकारी-
बस आप नहीं होंगे,
अपने माथे के घाव पोछते,
छिपते-छिपाते सुनते रहेंगे,
हर बाण।

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