धूप मे भी चांदनी को ढूढंता है आदमी

धूप मे भी चांदनी को ढूढंता है आदमी

और हकीकत को हमेशा भूलता है आदमी ॥

कौन उसको याद करता है खुशी के दौर में

दर्द मिलते ही खुदा को पूजता है आदमी ॥

पर्दा उठते ही भरी महफिल मे सन्नाटा गिरा

भेस भोला बस बनाकर लूटता है आदंमी ॥

मिल गई जिनको धरोहर जिन्दगी में प्यार की

बिन पिये हरदम यहां वह झूमता है आदमी॥

जब भी रिश्तो की  लगी हैं बोलियां बाजार में

अर्थ की दहलीज को ही चूमता है आदमी ॥

कौन आयेगा भला अब दास अब इस वीरान में

रूप के आगोश मे ही झूलता है आदमी ॥

 

शिवचरन दास

 

2 Comments

  1. r s lamba 07/08/2013

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