वो चाँदनी…

 

जब कभी सर्द रातों में,
गली के कुत्तों की आवाज़े,
नींद में ख़लल डालती हैं लोगों के,

और चाँदनी बादलों से उतर के,
गली के आवारा कुत्तों से बचती, छुपती,
खिड़की के कोने से झांकती है,
और कांच को टापते हुए,
मेरे बिस्तर तक, चुपके से आती है।

और वही पास रखे टेबल पे से,
जब पानी का ग्लास गिराती है,
तो कटोरी सी आँखों को मीचे,
चाँदी से दांतों तले उंगली दबाये,
चुपके से परदे के पीछे दुपक जाती है।

मेरे चौंक के उठने पर और इधर-उधर देखने पर,
जब कुछ भी आस-पास नहीं पाता हूँ,
तो मेरी उंघती आँखे, कोई बुरा सपना समझकर,
बिस्तर के आग़ोश में, खींच ले जाती है।

तो चाँदनी अपने ठन्डे हाथ-पैर लिए,
चुपके से, धीमे पांव,
मेरे बिस्तर तक आती है,
और वही कोने पर बैठकर,
मुझे निहारा करती है…

फिर धीरे-धीरे अपने ठिठुरते पैर
मेरी रज़ाई में, चुपके से डालते हुए,
थोड़ी घबराई, थोड़ी सहमी सी,
चुपचाप सी बैठी,
बदन गरमाया करती है।
वो चाँदनी…

–   शौर्य शंकर

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