स्वर्ण-किरण

पंचवटी को रौंदता
कुलाचें भरता
वह सोने का हिरण
मारीच की आत्मा लिए
सपने बिखेरता
वह स्वर्ण-किरण

ॠषियों का वन
मिट्टी का कण
फूल-पत्तों का मन
चांदनी-चमन
सब रोक रहे हैं
उसके चंचल चरण
किन्तु उसके छलिया नयन
बेच रहे धरती
और नीला गगन
वह सोने का हिरण
सपनों को बेचता
वह स्वर्ण-किरण।

Leave a Reply